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भाषा सम्प्रेषण और शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण
माध्यम है। इसलिए इनके विकास को राष्ट्रीय शिक्षा नीति और कार्य योजना में
महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसलिए जहॉं एक तरफ संविधान की VIII वीं अनुसूची
में सूचीबध्द हिन्दी और संस्कृत तथा उर्दू सहित अन्य 22 भाषाओं के प्रोन्नयन
और विकास पर उपयुक्त ध्यान दिया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी तथा अन्य
विदेशी भाषाओं के प्रोन्नयन और विकास पर भी इसी प्रकार ध्यान दिया गया है। इस
संवैधानिक उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए स्वायत्त संगठन और अधीनस्थ
कार्यालय उच्चतर शिक्षा विभाग की सहायता करते हैं।
2. प्रशासन, शिक्षा, न्यायालयों, विधानमंडलों,
जन-संचार इत्यादि में भाषाओं के प्रयोग के संबंध में भारत की भाषा नीति
बहुलवादी रही है। इसमें भाषा-विकास उन्मुख तथा भाषा-संरक्षण उन्मुख दोनों ही
बातों को शामिल किया गया है। इस नीति में नागरिकों को कतिपय निर्धारित स्तरों
पर और क्षेत्रों में कुछ क्रमिक प्रक्रियाओं के माध्यम से अपनी मातृभाषा का
प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है किन्तु इस नीति का मुख्य लक्ष्य
इन भाषाओं की प्रकृति अथवा स्तर जैसे मुख्य, छोटी अथवा जनजातीय भाषाओं पर
ध्यान दिए बिना इनके प्रयोग के निर्धारित क्षेत्रों में सम्प्रेषण के उपयुक्त
माध्यम के रूप में विकसित करना है। इस नीति को आपसी समझबूझ, सहमति और न्यायिक
प्रक्रियाओं के माध्यम से व्यवस्थित और सदैव विकसित करने वाली बनाया गया है।
3. मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के भाषा
ब्यूरो का मुख्य कार्य भाषा नीति को तैयार करना तथा इसके कार्यान्वयन का
अनुवीक्षण करना है। इस ब्यूरो द्वारा यह कार्य इसके तत्वावधान में इस
प्रयोजनार्थ स्थापित किए गए भाषा संस्थानों के माध्यम से पूरा किया जाता
है। ये है :- केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग,
केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, राष्ट्रीय सिन्धी
भाषा संवर्धन परिषद, राष्ट्रीय उर्दू भाषा प्रोन्नयन परिषद, राष्ट्रीय
संस्कृत संस्थान, एम.एस.आर.वी.वी.पी., केन्द्रीय अंग्रेजी और विदेशी भाषा
संस्थान।
भारत की भाषाएं
वर्ष 1961 की जनगणना के अनुसार आधुनिक भारत में
पांच विभिन्न भाषा परिवारों से आनुवांशिक रूप से सम्बंधित 1652 से भी अधिक
मातृ भाषाएं हैं। वर्ष 1991 की जनगणना से मातृभाषाओं के 10,400 छोटे-छोटे
विवरणों का पता चला था और इन्हें 1576 मातृभाषाओं के रूप में युक्तिसंगत
बनाया गया। इन्हें 216 मातृभाषाओं के रूप में युक्तिसंगत बनाया गया और 114
भाषाओं के तहत समूहबद्ध किया गया है: आस्ट्रो-एशियाटिक (कुल 1.13 प्रतिशत
जनसंख्या के साथ 14 भाषाएं), द्रविड (22.53 प्रतिशत जनसंख्या के साथ 17 भाषाएं),
भारती-यूरोपीय (75.28 प्रतिशत जनसंख्या के साथ भारत-आर्यन 19 भाषाएं, 0.02
प्रतिशत जनसंख्या के साथ जर्मन 1 भाषा), सेमिटो हारमिटिक (0.01 प्रतिशत
जनसंख्या के साथ 1 भाषा), और तिब्बत-बर्मा (0.97 प्रतिशत जनसंख्या के साथ 62
भाषाएं)। यह भी नोट किया जाए कि अखिल भारतीय स्तर पर 10000 से कम जनसंख्या
वाली मातृभाषाओं अथवा उपलब्ध भाषा सूचना के आधार पर जिन मातृभाषाओं को
अभिनिर्धारित न किया जा सकता हो, ऐसी मातृभाषाओं को अन्य भाषाओं के तहत रखा
गया है।
अधिकांश लोगों द्वारा इन्डो-आर्यन भाघाएं बोली जाती है। तत्पश्चात अवरोही
क्रम के अनुसार द्रविड, आस्ट्रो एशियाई और चीनी-तिब्बती (तिब्बती-वर्मा)
भाषाओं का स्थान आता है।
बाइस भारतीय भाषाओं: असमी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिन्दी, कश्मीरी,
कन्नड, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उडिया, पंजाबी,
संस्कृत, संथाली, सिन्धी, तमिल, तेलुगू और उर्दू को संविधान की आठवीं अनुसूची
में शामिल किया गया है। इनमें से संस्कृत तथा तमिल को प्राचीन भाषा का दर्जा
प्रदान किया गया है।
भारतीय बहु-भाषाई व्यवस्था अनेक प्रकार से बेमिसाल है- यह प्राकृतिक रूप से
विकसित हुई है और अध्ययन व्यवस्था के माध्यम से विकसित होने वाले
बहु-भाषावाद से जुड़ी हुई है।
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