|
|
पॉलीटेक्नीक
समुदाय पॉलीटेक्नीक
-
समुदाय पॉलीटेक्निक योजना देश भर में
665 एआईसीटीई अनुमोदित पॉलीटेक्निकों के जरिए क्रियान्वित की जाती है। वर्ष
2007-08 में इस योजना का क्रियान्वयन इसकी समीक्षा किए जाने तक लम्बित रखा गया।
उम्मीद है कि समीक्षा समिति अपनी रिपोर्ट शीघ्र प्रस्तुत कर देगी।
-
विकलांगों को तकनीकी तथा व्यवसायिक
शिक्षा की मुख्य धारा में लाने के लिए मौजूदा पॉलीटेक्निकों के उन्नयन की
योजना
-
यह योजना वर्ष 1999-2000 में 50
विद्यमान पॉलीटेक्निकों से शुरू की गई थी। प्रत्येक पॉलिटेक्निक सामान्य
छात्रों सहित 25 विकलांग छात्रों को डिप्लोमा स्तरीय पाठयक्रम और 100 विकलांग
छात्रों को व्यावसायिक प्रषिक्षण प्रदान करता है। इस योजना का उद्देश्य
सामान्य एवं विशेष कार्यक्रम के जरिए कौशल विकास कार्यक्रमों और तकनीकी एवं
व्यावसायिक शिक्षा की मुख्यधारा में शामिल करके विकलांग व्यक्तियों के लिए
शिक्षा एवं प्रशिक्षण को प्रोन्नत करना है।
प्रशिक्षु
प्रशिक्षण
योजना
-
प्रशिक्षु प्रशिक्षण योजना का
कार्यान्वयन प्रशिक्षु अधिनियम, 1961 के अन्तर्गत एक सांविधिक अपेक्षा है।
प्रशिक्षु प्रशिक्षण योजना के तहत केन्द्रीय प्रशिक्षु परिषद जो प्रशिक्षु
अधिनियम, 1961 के तहत गठित एक सर्वोच्च सांविधिक निकाय है, जिसमें निर्धारित
नीतियों और दिशा-निर्देशों के अनुसार लगभग 10000 औद्योगिक प्रतिष्ठानों/संगठनों
में स्नातक इंजीनियरों, डिप्लोमा धारकों (तकनीशियनों) और 10+2 व्यावसायिक
पाठयक्रम उत्तीर्ण छात्रों के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण की व्यवस्था है।
-
इस योजना का मुख्य उद्देश्य जहां तक
स्नातक इंजीनियरों, डिप्लोमा धारकों और 10+2 व्यावसायिक पाठयक्रम उत्तीर्ण
छात्रों के लिए व्यावहारिक/वास्तविक अनुभव करवाने का है, ताकि उन्हें
उद्योगों की आवश्यकता के अनुसार उनकी उपयुक्तता के आधार पर तकनीकी कौशल
प्रदान करके उन्हें सेवा योग्य बनाया जा सके।
-
मुम्बई, कोलकाता, कानपुर और चेन्नई में
स्थित चार क्षेत्रीय प्रशिक्षु बोर्ड/व्यावहारिक प्रशिक्षण बोर्ड जो मानव
संसाधन विकास मंत्रालय (माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा विभाग) के तहत पूर्णत:
वित्तपोषित स्वायत्त संगठन हैं, को प्रशिक्षु अधिनियम, 1961 के अन्तर्गत
प्रशिक्षु प्रशिक्षण योजना को कार्यान्वित करने के लिए उनके संबंधित क्षेत्रों
में प्राधिकृत किया गया है।
-
इस अधिनियम के अन्तर्गत प्रशिक्षु
प्रशिक्षण की अवधि एक वर्ष है। प्रशिक्षुओं को मासिक शिक्षावृत्ति दी जाती है
जिसे केन्द्र सरकार और नियोक्ता के बीच 50:50 के आधार पर वहन किया जाता है।
इंजीनियरी स्नातकों, तकनीशियनों और व्यावसायिक पाठयक्रम से 10+2 उत्तीर्ण
छात्रों को प्रतिमाह क्रमश: 2600/-रू., 1850/-रू. और 1440/-रू. की
शिक्षावृत्ति दी जाती है। औद्योगिक प्रतिष्ठानों/संगठनों द्वारा प्रशिक्षु
प्रशिक्षण ले रहे प्रशिक्षुओं को पहली बार पूर्ण वजीफा दिया जाता है और वे
बाद में संबंधित बोट/बीओपीटी के जरिए केन्द्र से 50 प्रतिशत प्रतिपूर्ति का
दावा करते हैं।
दूरस्थ
शिक्षा तथा वेब आधारित अधिगम के लिए सहायता (एनपीटीईएल)
-
प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हुए तकनीकी
शिक्षा के क्षेत्र में अधिगम प्रभावित में वृध्दि करने के लिए मानव संसाधन
विकास मंत्रालय ने 2003 में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी उन्नत अधिगम कार्यक्रम (एनपीटीईएल)
की शुरूआत की। इसे पाठयचर्या आधारित वीडियो पाठयक्रम (न्यूनतम 100) तथा वेब
आधारित ई-पाठयक्रमों (न्यूनतम 115) का विकास करके किया जा रहा है जिन्हें
20.47 करोड़ रू. के कुल परिव्यय के साथ भागीदार संस्थानों के रूप में दिल्ली,
मुम्बई, मद्रास, कानपुर, खड़गपुर, गुवाहाटी, रूड़की स्थित सात आईआईटी और
आईआईएससी, बंगलौर द्वारा तैयार किया जाएगा।
-
एनपीटीईएल के पहले चरण में परियोजना में
पांच प्रमुख इंजीनियरिंग शाखाओं नामत: सिविल, कम्प्यूटर विज्ञान, इलैक्ट्रीकल,
इलैक्ट्रानिक्स तथा दूरसंचार और मैकेनिकल इंजीनियरिंग में अवर स्नातक
पाठयचर्या के कोर पाठयक्रमों को कवर किया गया है। इनका कोर विज्ञान तथा
प्रबंधन कार्यक्रम, भाषा तथा इलैक्ट्रानिक्स, सांख्यिकी प्रणाली इत्यादि जैसे
अन्य बेसिक पाठयक्रमों द्वारा अनुपूरण किया जाता है जो सभी इंजीनियरिंग छात्रों
के लिए आवश्यक है। अन्ना विश्वविद्यालय, विश्वेषश्वरैया तकनीकी विश्वविद्यालय
और जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विष्वविद्यालय जैसे प्रमुख संबंधन
विष्वविद्यालयों द्वारा इंजीनियरिंग में पाठयक्रम घटक तैयार करने हेतु
एआईसीटीई पाठयचर्या को अपनाया गया है।
-
इस कार्यक्रम को 3 सितम्बर, 2006 को
आईआईटी, मद्रास में माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह द्वारा
आरंभ किया गया। इसके घटक भारत में सभी को और विदेशों में आईआईटी,, मद्रास
द्वारा संचालित वेबसाइट http://nptel.iitm.ac.in द्वारा उपलब्ध करवाए जा रहे
हैं। एकलव्य चैनल के जरिए वीडियो आख्यान प्रसारित किए जा रहे हैं और देश में
लगभग 50 इंजीनियरिंग संस्थाओं ने अपने परिसर में सिग्नल प्राप्त करने हेतु एक
डिशएंटीना के साथ अपने रिसीवरों की स्थापना की है।
-
2008 से 2011 (तीन वर्ष) के दौरान
एनपीटीईएल चरण-॥ के कार्यान्वयन का प्रस्ताव विचाराधीन है। परियोजना के लिए
भागीदार संस्थान सात आईआईटी और आईआईएससी, बंगलौर (पहले चरण जैसे ही) होंगे।
परियोजना में 500 से ज्यादा संकाय सदस्यों के भाग लेने की आशा है और
कार्यक्रम के लाभार्थी देश में सभी इंजीनियरिंग एवं भौतिकीय विज्ञान अवर
स्नातक/स्नातकोत्तर; भारत में विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विश्वविद्यालयों में
सभी अध्यापक/संकाय सदस्य होंगे। परियोजना का उद्देश्य एनपीटीईएल पहले चरण में
3.9.2006 में शुरू किए गए कार्यक्रम तैयार करना तथा भारत में सर्वोत्तम शिक्षा
का प्रयोग करते हुए विज्ञान तथा इंजीनियरिंग में संकाय सदस्यों के बीच
आन-लाइन पाठयक्रम घटक तथा वार्तालाप तैयार करना है।
इंजीनियरिंग विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारतीय राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालय
(इन्डेस्ट-एआईसीटीई कर्न्सोटियम)
राष्ट्रीय भूकम्प इंजीनियरिंग शिक्षा कार्यक्रम
-
जनवरी, 2001 में गुजरात भूकंप के
पश्चात
तथा वर्ष 2000 में उड़ीसा चक्रवात के पश्चात संसाधन संस्थानों के रूप में सात
आईआईटी और आईआईएससी, बंगलौर के साथ मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 2003
में राष्ट्रीय भूकंप इंजीनियरिंग शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया गया। आईआईटी,
कानपुर समन्वय संस्थान है। यह कार्यक्रम सभी पंजीकृत इंजीनियरिंग कालेजों/पालीटेक्निकों
तथा वास्तुकला स्कूल जिनमें संबध्द शैक्षिक डिग्री अथवा डिप्लोमा कार्यक्रम
चलाए जाते हों चाहे वे सरकार द्वारा वित्तपोषित हों अथवा निजी व्यक्तियों
द्वारा वित्तपोषित हों, सभी के लिए खुला है। एनपीईईई के उद्देश्य है:-
(क) इंजीनियरिंग कालेजों, पालीटेक्निकों
तथा स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर के अध्यापकों को प्रशिक्षित करना, और
(ख) समुचित पाठयचर्या का विकास करना।
-
देश में कई प्रमुख संस्थानों ने अन्य
संस्थानों में संकाय विकास में सहायता की है। यह केन्द्र द्वारा वित्तपोषित
एक कार्यक्रम के अंतर्गत लघु तथा दीर्घावधि प्रशिक्षण के माध्यम से
इंजीनियरिंग कालेज के अध्यापकों को प्रशिक्षण देने में मदद देगा। इस
राष्ट्रीय पहल के तहत क्रियाकलापों में शामिल हैं :-
-
लघु अवधि क्रेष पाठयक्रम तथा दीर्घावधि
कार्यक्रमों के जरिए संकाय विकास।
-
संसाधन सामग्री/पाठयपुस्तकों इत्यादि का
विकास।
-
तकनीकी संस्थाओं में पुस्तकालय संसाधन
विकास।
-
देश में प्रमुख संस्थानों तथा अन्य
संस्थानों के बीच संकाय आदान-प्रदान तथा शिक्षा उद्योग जगत के बीच
आदान-प्रदान।
-
अन्तर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान जहां
प्रबुध्द विदेशी विशेषज्ञ अध्यापन तथा अनुसंधान हेतु भारतीय संस्थाओं का दौरा
कर सकते हैं तथा युवा भारतीय अध्यापक/व्यवसायिक इस विषय पर सर्वोच्च
अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में कार्य कर सकेंगे।
-
विभिन्न इंजीनियरिंग संस्थानों पर बेसिक
अध्यापन प्रयोगशालाओं का वित्तपोषण किया जा सकता है। प्रमुख संस्थाओं में ये
प्रस्तावित कार्यक्रम प्रमुख अनुसंधान प्रयोगशालाओं के विकास का वित्तपोषण
कर सकते हैं जिन्हें अन्य संस्थाओं द्वारा भी प्रयोग किया जाएगा।
-
कार्यक्रम के पहले चरण के माध्यम से देश
में भूकम्प इंजीनियरिंग में क्षमता निर्माण की पहल रही है और जीवन तथा
सम्पत्ति के नुकसान के बगैर भविष्य में भूकम्प से निपटने की देश की तैयारी
में वृध्दि हुई है। जून, 2007 में समाप्त पहले चरण में परियोजना की कुल लागत
13.74 करोड़ रू. है। दूसरे चरण के कार्यान्वयन के लिए इस योजना की समीक्षा की
जा रही है। (www.nicee.org/npeee)
प्रौद्योगिकी विकास मिशन
-
1993 में सभी आईआईटी और आईआईएससी में
प्रौद्योगिकी विकास मिशन (टीडीएम) की स्थापना की गई थी। इसका उद्देश्य
उद्योगजगत की सीधी भागीदारी के साथ प्रौद्योगिकी के विकास का राष्ट्रीय
प्रयास करना हैं। राष्ट्रीय महत्व के क्षेत्रों में पूर्ण परिभाषित
उद्देश्यों, माइलस्टोन और उपलब्धियों के साथ कई मिशन परियोजनाओं की पहचान की गई।
अधिकांश
मिशन परियोजनाओं में दो या अधिक षैक्षिक संस्थानों तथा उद्योगों ने भाग लिया।
इन मिशन क्षेत्रों का वित्त पोषण निम्नानुसार था :-
-
मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 50.00
करोड़ रू. की राशि से इन परियोजनाओं का वित्तपोषण किया।
-
15.00 करोड़ रू. के उपकरण, घटक, श्रमिक
और हार्डवेयर के रूप में सहायता के अतिरिक्त लगभग 9.00 करोड़ रू. का उद्योग
भागीदारी सहयोग।
-
इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नवीनतम
प्रौद्योगिकी के विकास में उद्योग जगत को सहायता देना तथा उद्योग संस्थान के
वार्तालाप को प्रोत्साहन देना सरकार की ओर से एक महत्वपूर्ण प्रयास था। ऐसा
पहली बार हुआ था कि उद्योग जगत के साथ मिशन उन्मुखी कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक चलाया गया था।
-
टीडीएम-। सफल था और योजना आयोग की
राष्ट्रीय संचालन समिति की 6 अगस्त, 1999 को नई दिल्ली में आयोजित बैठक में
इसकी काफी प्रशंसा की गयी। टीडीएम-। के परिणामस्वरूप उद्योगों को विकास तथा
कई प्रौद्योगिकियों का हस्तांतरण हुआ अर्थात :
1- ऊर्जा वितरण का स्वचलन
2- एड्स के लिए इम्यूनो डायाग्नोस्टिक टेस्ट
3- हैपेटाइटिस-बी हेतु टीके
4- सुपरक्रिटिकल फलूइड एक्ट्रेशन तकनीक
5- खाद्यानों के लिए नियंत्रित वातावरण भंडारण तकनीक
6- पहला 50 किलोग्राम का पेलोड रोबोट
7- स्वचालित मानीटरन प्रणाली
8- मेटल मैट्रिक्स कम्पोजिट पिस्टन के लिए स्कबीज कास्टिंग तकनीक
9- कृषि उत्पादों के लिए पर्यावरण अनुकूल वेपर कम्प्रेशन हीट पम्प सहित
ड्रायर, इत्यादि।
-
अधिकांश लक्ष्य प्राप्त किए गए। आईआईटी
तथा आईआईएससी, में तदनुसार उद्योग-प्रायोजित अनुसंधान में वृध्दि ने इस बात
की पुष्टि की कि टीडीएम-। कार्यक्रम ने उद्योग जगत की वर्तमान प्रौद्योगिकी
कठिनाईयों का हल करने तथा नई प्रौद्योगिकियों और उत्पादों के विकास में उनकी
सहायता करने के लिए भारतीय शैक्षिक संस्थाओं की क्षमताओं में विश्वास का
वातावरण तैयार किया। टीडीएसम-। के कुछ महत्वपूर्ण लाभ थे :
-
पहली बार उद्योग जगत तथा आईआईटी ने
मिशनोन्मुखी कार्यक्रमों में सहयोग किया।
-
उद्योग जगत प्रौद्योगिकी समस्याओं को हल
करने तथा नए उत्पादों का सफलतापूर्वक विकास करने में आईआईटी और आईआईएससी की
क्षमताओं के बारे में सहमत थे।
-
आईआईटी तथा आईआईएससी में उद्योग जगत
द्वारा प्रायोजित अनुसंधान में वृध्दि ।
-
इन सर्वोच्च संस्थानों में शैक्षिक
सहयोग में वृध्दि।
|
|